धान खरीदी की तैयारी पूरी होने का सरकार का दावा फेल, मंडियों में अव्यवस्था से किसान बेहाल

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सरकार भले ही यह दावा कर रही हो कि धान खरीदी की पूरी तैयारी कर ली गई है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर दिखा रही है। मंडियों में पहुंचते ही किसानों को पता चल जाता है कि सरकार का दावा सिर्फ बयानबाज़ी है, वास्तविक काम शून्य।

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मंडियों में न फड़ों की ठीक से सफाई हुई है, न कर्मचारियों की मौजूदगी दिखाई देती है। किसान पूछ रहे हैं—
“अगर तैयारी पूरी है, तो ये बदहाल मंडियां क्यों?”

सरकार ने 3100 रुपये एकमुश्त राशि देने का बड़ा वादा किया था, लेकिन वह भी अब हवा-हवाई साबित होता दिख रहा है। किसानों का आरोप है कि समर्थन मूल्य का झांसा देकर सरकार उन्हें बरगलाने का काम कर रही है।

धान बेचने के लिए किसानों पर तरह-तरह के नियम थोप दिए गए हैं।
कहीं एकीकृत पंजीयन, कहीं एग्रीस्टैक…
कागज़, ओटीपी, दस्तावेज़ और ऑनलाइन प्रक्रियाओं के चक्कर में किसान की मेहनत बेकार हो रही है।

धान खरीदी के नाम पर दिखावा तो बहुत है, लेकिन किसानों के लिए सुविधा शून्य।

किसान बेहाल होकर पूछ रहे हैं—
“ऐसी अव्यवस्था में धान कैसे बेचें? कर्ज़ से राहत कब मिलेगी? क्या सरकार सिर्फ दावे करने के लिए बैठी है?”

धान खरीदी शुरू होने से पहले ही हालात बेकाबू हैं, और किसानों के मुताबिक इस बार भी संकट भारी है—सरकार का दावा नहीं।

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