SECL में ₹336.78 करोड़ के कथित ग्रेड स्लिपेज घोटाले की शिकायत, PMO-CBI-ED तक पहुंचा मामला

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कोरबा/बिलासपुर/नई दिल्ली। देश की प्रमुख कोयला कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। इस बार एक आरटीआई कार्यकर्ता एवं पत्रकार ने SECL के बिलासपुर मुख्यालय और कोरबा क्षेत्र में ₹3,36,78,21,990.88 की कथित वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाते हुए इसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) सहित कई केंद्रीय एजेंसियों को भेजी है।

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शिकायतकर्ता जितेंद्र कुमार साहू का आरोप है कि वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2023-24 के बीच कोयले की गुणवत्ता (ग्रेड) में कथित गिरावट दिखाकर निजी कंपनियों को करोड़ों रुपये के क्रेडिट नोट और रिफंड जारी किए गए, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हुआ।

क्या है पूरा आरोप?

शिकायत के अनुसार, खदानों से कोयला उच्च ग्रेड (जैसे G4, G5) के रूप में भेजा गया और उसी आधार पर बिल जारी किए गए। बाद में थर्ड पार्टी सैंपलिंग के आधार पर गुणवत्ता कम बताकर निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर रिफंड जारी किए गए। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया सुनियोजित वित्तीय अनियमितता का हिस्सा है।

SECL का क्या है पक्ष?

CPGRAMS के माध्यम से दर्ज शिकायत के जवाब में एरिया क्वालिटी मैनेजर, कोरबा ने 1 जून 2026 को दिए गए उत्तर में कहा कि कोयले में स्वतः ताप (Self Heating) की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जिससे समय के साथ उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर गुणवत्ता में अंतर को सामान्य तकनीकी प्रक्रिया बताया गया।

हालांकि शिकायतकर्ता ने 9 जुलाई 2026 को इस जवाब पर आपत्ति दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि यह रिपोर्ट जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने का प्रयास है। उनका कहना है कि यदि वर्षों से ऐसी समस्या थी तो उसे रोकने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए।

आरटीआई और सूचना छिपाने का भी आरोप

शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि इस मामले से संबंधित वित्तीय जानकारी आरटीआई के माध्यम से उपलब्ध नहीं कराई जा रही है तथा सूचना आयोग के समक्ष भी भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई।

शिकायतकर्ता की प्रमुख मांगें

  • पूरे मामले में स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
  • पिछले सात वर्षों में जारी सभी क्रेडिट नोट और रिफंड का फॉरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
  • यदि जांच में अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण कानून एवं अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए।
  • मामले की निगरानी न्यायालय के स्तर पर कराई जाए।

जांच के बाद ही स्पष्ट होगी सच्चाई

फिलहाल यह मामला शिकायत और आरोपों के स्तर पर है। संबंधित केंद्रीय एजेंसियों या SECL की ओर से इन आरोपों की पुष्टि या खंडन करते हुए कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सार्वजनिक नहीं आया है। ऐसे में जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोप कितने सही हैं और क्या वास्तव में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता हुई है।

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