सुशासन तिहार या आवाज उठाने वालों को सजा? पाली अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर होते ही पीड़ित परिवार पर दबाव के आरोप

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कोरबा जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाली की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद अब नया विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि खबर प्रकाशन और वीडियो वायरल होने के बाद स्वास्थ्य विभाग व्यवस्था सुधारने के बजाय अब पीड़ित परिवार को ही परेशान करने में जुट गया है।
पीड़ित परिवार का कहना है कि बच्चे की तबीयत ठीक हो जाने के बावजूद अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जा रही है। इतना ही नहीं, स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा बार-बार फोन कर अस्पताल बुलाया जा रहा है और कथित तौर पर कहा जा रहा है कि —
“जब तक तुम नहीं आओगे, बच्चे को डिस्चार्ज नहीं करेंगे।”
परिजनों का आरोप है कि उनसे यह भी कहा गया कि उन्होंने इंस्टाग्राम और यूट्यूब में सरकारी अस्पताल का वीडियो वायरल किया है, इसलिए उन्हें “पनिशमेंट” दिया जाएगा और उनके खिलाफ थाने में शिकायत भी की गई है।
अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि —
क्या सरकारी अस्पताल की बदहाली उजागर करना गुनाह है?
क्या जमीन पर मासूम को बोतल चढ़ते देख भी लोगों को खामोश रहना चाहिए था?
क्या आवाज उठाने वालों को डराकर चुप कराने की कोशिश की जा रही है?
एक तरफ सरकार “सुशासन तिहार” मनाकर जनता की समस्याएं सुनने और समाधान का दावा कर रही है…
तो दूसरी तरफ पाली अस्पताल का मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
क्या यही सुशासन है?
जहां शिकायत करने वाले को ही प्रताड़ित किया जाए?
जहां स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के बजाय सवाल उठाने वालों को निशाना बनाया जाए?
सबसे हैरानी की बात यह है कि मामला सोशल मीडिया में वायरल होने और खबरें प्रकाशित होने के बावजूद अब तक किसी उच्च अधिकारी ने खुलकर संज्ञान नहीं लिया है।
इस संबंध में जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कोरबा डॉ. एस.एन. केसरी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।

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अब देखना होगा कि —
क्या उच्च अधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करेंगे?
क्या जिम्मेदार स्वास्थ्य कर्मियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर पीड़ित परिवार को ही दबाव और प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा?
पाली अस्पताल का यह मामला अब सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली और सुशासन के दावों पर भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

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