जांजगीर-चांपा जिले के पहरिया धान खरीदी केंद्र से सामने आई हकीकत ने शासन–प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है। यहाँ नियम सिर्फ कागजों में हैं, जबकि ज़मीन पर किसानों की खुलेआम हक़मारी की जा रही है।

नियम बनाम सच्चाई
नियम के मुताबिक धान खरीदी में 40 किलो धान + बोरे का वजन लिया जाना चाहिए, लेकिन पहरिया केंद्र में प्रति बोरा 500 ग्राम से 1 किलो तक अतिरिक्त धान लिया जा रहा है।
पत्रकारों की मौजूदगी में 7–8 बोरों की तौल कराई गई — एक भी बोरा सही वजन का नहीं निकला। यह साफ करता है कि यह गलती नहीं, बल्कि सुनियोजित लूट है।

सुरक्षा राशि कहां गई?
धान खरीदी प्रभारी जयप्रकाश सिंह अपने ही केंद्र की जानकारी देने में नाकाम नजर आए। जब उनसे पूछा गया कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए कितनी राशि मिली, तो वे जवाब नहीं दे सके।
जबकि शासन द्वारा ₹2.40 प्रति क्विंटल सुरक्षा मद में दिया जाता है, लेकिन केंद्र पर सुरक्षा व्यवस्था नाम मात्र की भी नहीं दिखी।
चट्टा नियमों की खुलेआम धज्जियाँ
चट्टा नियमों के अनुसार नहीं लगाया गया
केवल किनारों पर दिखावे के लिए भूसी
अंदर पूरी तरह नियमों की अनदेखी
जमीन पर चट्टा, जहां दो लेयर भूसी अनिवार्य, वहां सिर्फ एक लेयर
किसान बना मजदूर
प्रशासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि
किसानों से न पैसे मांगे जाएंगे, न काम कराया जाएगा
लेकिन पहरिया केंद्र में किसान ही—
धान पलट रहे हैं
बोरे सिल रहे हैं
तौल रहे हैं
एक किसान ने बताया कि उसे अपने साथ मजदूर लाना पड़ा, और मजदूरी भी अपनी जेब से देनी पड़ी — सिर्फ इसलिए कि उसकी धान की तौल और सिलाई हो सके।
जनपद सीईओ के निरीक्षण पर गंभीर सवाल
धान खरीदी प्रभारी का दावा है कि कुछ दिन पहले जनपद पंचायत बलौदा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अपनी टीम के साथ निरीक्षण पर आए थे, लेकिन उन्हें कोई खामी नजर नहीं आई।
अब सवाल सीधे और तीखे हैं—
क्या निरीक्षण सिर्फ औपचारिकता था?
क्या अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं?
या फिर अब भी मामला दबा दिया जाएगा?
जानकारी देने से बचते प्रभारी
जब धान खरीदी प्रभारी जयप्रकाश सिंह से जानकारी मांगी गई, तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि
“11 गांव के किसानों से बैठक कर सूखती के नाम पर 500 से 700 ग्राम अतिरिक्त देने की बात हुई है।”
इसके अलावा उन्होंने कोई भी जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया।
पहरिया धान खरीदी केंद्र की यह तस्वीर जनपद सीईओ, धान खरीदी प्रभारी और पूरे प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अगर अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मानना पड़ेगा कि किसानों की लूट में सिस्टम खुद साझेदार है।
