कोरबा में आयोजित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के कार्यक्रम ने एक बार फिर प्रशासनिक संवेदनहीनता और सत्ता के घमंड को उजागर कर दिया। जिस कार्यक्रम में सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान करने पहुंची थी, उसी मंच पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—पत्रकारों—का खुला अपमान कर दिया गया।
कार्यक्रम स्थल पर पत्रकारों के लिए न तो समुचित बैठक व्यवस्था थी, न छांव, न ही बुनियादी सम्मान। तेज धूप में जमीन पर बैठने को मजबूर पत्रकारों ने जब आपत्ति जताई, तो प्रशासन की ओर से कोई ठोस जवाब या त्वरित व्यवस्था देखने को नहीं मिली। परिणामस्वरूप आक्रोशित पत्रकारों ने इसे अपमानजनक और अस्वीकार्य बताते हुए मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का सामूहिक बहिष्कार कर दिया।
यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में केवल सत्ता पक्ष के लिए ही सुविधाएं आरक्षित होती हैं? क्या सरकार को अपनी छवि चमकाने के लिए मीडिया चाहिए, लेकिन मीडिया के सम्मान की कोई जिम्मेदारी नहीं? यदि पत्रकार ही सुरक्षित और सम्मानित नहीं होंगे, तो लोकतंत्र की जवाबदेही कौन तय करेगा?
पत्रकारों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि सोच का दिवालियापन है। प्रशासन की यह लापरवाही सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। यदि मुख्यमंत्री अपने ही कार्यक्रम में मीडिया की गरिमा सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो आम जनता के सम्मान की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यह घटना एक चेतावनी है—लोकतंत्र दिखावे से नहीं, सम्मान से चलता है। पत्रकारों को धूप में बैठाकर सत्ता ठंडी छांव में नहीं रह सकती। यदि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हुई, तो विरोध और भी मुखर
सीएम के कार्यक्रम में लोकतंत्र का अपमान, धूप में तपते पत्रकारों को मिला ‘अव्यवस्था का पुरस्कार’
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