पत्रकारिता की आड़ में वसूली! कापन धान खरीदी केंद्र में किसानों की खुली लूट

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जांजगीर जिले के कापन धान खरीदी केंद्र से जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी प्रशासनिक चूक की नहीं बल्कि सुनियोजित लूट और संरक्षण प्राप्त अव्यवस्था की कहानी बयां करती है। यहां धान नहीं, किसानों का हक तौला जा रहा है — और वह भी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाकर।

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नियम साफ कहते हैं कि 40 किलो धान + बोरे का वजन लिया जाएगा, लेकिन हकीकत यह है कि हर बोरे में एक किलो तक की अवैध कटौती की जा रही है। किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि उन्होंने कैमरे के सामने बोल दिया तो उन्हें बेवजह परेशान किया जाएगा। किसानों का साफ कहना है कि अधिकारी औचक निरीक्षण करें तो सच्चाई खुद सामने आ जाएगी।
यह कोई भूल नहीं, बल्कि सोची-समझी और सिस्टमेटिक वसूली है।


सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा राशि को लेकर है। सरकार द्वारा ₹2.40 प्रति क्विंटल सुरक्षा मद दी जाती है, लेकिन केंद्र में न कोई गार्ड दिखा, न कोई व्यवस्था। सवाल पूछने पर खरीदी प्रभारी जवाब देने से बचते नजर आए।
धान खरीदी के नियम कागजों तक सीमित हैं। जहां दो लेयर भूसी अनिवार्य है, वहां केवल एक लेयर, वह भी किनारे पर। अंदर धान बिना भूसी के रखा जा रहा है। कागजों में सब सही, लेकिन ज़मीन पर पूरी तरह फेल व्यवस्था।
किसानों को यहां किसान नहीं बल्कि मजदूर बना दिया गया है। धान पलटना, बोरा सिलाई, तौल — सब काम किसान खुद कर रहे हैं। एक किसान ने बताया कि मजदूर साथ लाना पड़ा, मजदूरी भी अपनी जेब से देनी पड़ी, तब जाकर तौल संभव हो सकी।
इतना ही नहीं, धान को खराब बताकर पैसों की मांग की गई। पैसा नहीं देने पर धान वापस ले जाने की धमकी दी गई। किसान मजबूर था — वाहन किराया और मजदूरी के नुकसान से बचने के लिए उसने पैसे देकर धान बेचना ही बेहतर समझा।
जब इन गंभीर आरोपों पर खरीदी प्रभारी से कैमरे पर जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ इंकार करते हुए धमकी भरे लहजे में कहा — “जो छापना है, छाप दो।” यही नहीं, केंद्र में मौजूद एक व्यक्ति खुद को दैनिक भास्कर का पत्रकार बताकर रौब झाड़ता रहा। सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अब किसानों को डराने का हथियार बन चुकी है?
मामले की जानकारी अकलतरा एसडीएम सुमित बघेल को दी गई है, जिन्होंने जांच कराने की बात कही है। वहीं तहसीलदार शशि भूषण सोनी से संपर्क की कई कोशिशों के बावजूद उन्होंने कॉल नहीं उठाया। यह चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है।

अब सवाल प्रशासन से है —
क्या कापन धान खरीदी केंद्र की निष्पक्ष जांच होगी?
या फिर हर बार की तरह निरीक्षण के नाम पर सब कुछ “मैनेज” कर दिया जाएगा?

यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मानने में कोई संकोच नहीं कि किसानों की इस लूट में सिस्टम खुद कटघरे में खड़ा है।

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