धान खरीदी को लेकर सरकार के बड़े-बड़े दावे अब खोखले साबित हो रहे हैं। कोरबा जिले के चिकनिपाली धान खरीदी केंद्र समेत लगभग सभी समितियों में हालात ऐसे हैं कि किसान अपना ही धान बेच पाने को तरस रहे हैं। प्रतिदिन की तय लिमिट इतनी कम है कि टोकन ही नहीं कट पा रहे, और बिना टोकन के खरीदी सिर्फ कागज़ों में सिमट कर रह गई है।
सरकार कहती है “किसानों का एक-एक दाना खरीदा जाएगा”, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसान ऑनलाइन टोकन काटने बैठता है तो सॉफ्टवेयर “गोल-गोल घूमकर” शून्य हो जाता है। घंटों की मशक्कत के बाद भी टोकन नहीं कटता। समिति पहुंचने पर जवाब मिलता है — “आज लिमिट पूरी हो गई”।
किसान रोज़ पेट्रोल जलाकर, काम-धंधा छोड़कर समिति पहुंचता है, लेकिन खाली हाथ लौटने को मजबूर है। यह सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे किसान की जेब पर डाका है।
गिरदावरी में गड़बड़ी, किसान की फसल फंसी
धान खरीदी में एक और बड़ी समस्या गिरदावरी को लेकर सामने आ रही है। कई किसान गिरदावरी रिकॉर्ड से असंतुष्ट हैं। राजस्व अमला गिरदावरी सत्यापन के नाम पर खरीदी रोक रहा है, जबकि किसानों के घरों में धान भरा पड़ा है। रकबा सही है या गलत — इसकी जांच प्रशासन करे, लेकिन जब तक जांच चले, तब तक किसान का धान क्यों सड़ने दिया जा रहा है?
टोकन का खेल — ऑनलाइन 70%, ऑफलाइन 30%
टोकन सिस्टम भी किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। 70 फीसदी टोकन ऑनलाइन और 30 फीसदी ऑफलाइन होने के कारण समिति पहुंचने वाले किसान मायूस होकर लौट रहे हैं। लिमिट कम, टोकन कम और व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है।
खाद में कालाबाजारी, अब धान में भी लूट!
किसानों का आरोप है कि खेती के समय खाद के लिए परेशान किया गया और अब धान बेचने के लिए टोकन के नाम पर उन्हें दौड़ाया जा रहा है। सरकार सिर्फ मंचों से दावे करती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे कोसों दूर है।
यह समस्या सिर्फ चिकनिपाली की नहीं, बल्कि पूरे कोरबा जिले की है। सवाल साफ है —
क्या सरकार सच में किसान की फिक्र करती है या सिर्फ चुनावी नारों तक ही उसकी संवेदना सीमित है?
अगर जल्द ही धान खरीदी की लिमिट नहीं बढ़ाई गई, गिरदावरी की गड़बड़ियां नहीं सुधरीं और टोकन व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में किसान सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा — और इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
