“जांच अधिकारी की जल्दबाजी या साजिश? शिकायतकर्ता को दरकिनार कर दिया ‘निराधार’ का ठप्पा!”

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**जांच अधिकारी और समिति प्रबंधन पर उठे सवाल!

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शिकायतकर्ता को बुलाए बिना फटाफट जांच निपटाई — आखिर इतनी जल्दबाज़ी क्यों?**

कोरबा। धान खरीदी केंद्र करतला, केरवाद्वारी,उमरेली और सुखरिकला में लाखों की राशि वाले अनिवार्य अमानत और रिवाल्विंग खातों में संभावित गड़बड़ियों की शिकायत पर सहकारिता विभाग द्वारा की गई जांच अब खुद ही शक के घेरे में आ गई है। विभाग ने शिकायतकर्ता को एक बार भी बुलाए बिना जांच पूरी कर दी—और आश्चर्यजनक रूप से जांच अधिकारी को “कोई खामी” नजर नहीं आई।

यह पूरा मामला अब गंभीर सवालों और शक की मोटी परतों से घिर चुका है।

**आखिर शिकायतकर्ता को जानकारी क्यों नहीं दी गई?

क्या छुपाना चाहते थे? किस बात का डर था?**

कलेक्टर जनदर्शन में श्री सरोज कुमार रात्रे द्वारा धान खरीदी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की आशंका जताने के बाद जांच का आदेश तो दिया गया, पर प्रक्रिया इतनी “गुप्त” रखी गई कि स्वयं शिकायतकर्ता को भी पता नहीं चलने दिया गया कि जांच कब, कहाँ और कैसे हुई!

जांच में आरोपित पक्ष — समिति प्रबंधक — को तो सुना गया, लेकिन शिकायतकर्ता को दरकिनार कर दिया गया।
क्या यह उसी व्यक्ति के बयान पर जांच निपटाने की कोशिश थी जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी?

जांच अधिकारी ने बिना शिकायतकर्ता से बात किए ही कैसे निष्कर्ष दे दिया?

क्या समिति प्रबंधक के बयान को ही “सत्य” मान लिया गया?

क्या दस्तावेजों का वास्तविक मिलान हुआ या सिर्फ औपचारिकता पूरी की गई?

क्या यह पूरी जांच पहले से तय निष्कर्ष पर आधारित थी?

“निराधार” करार देने की जल्दबाज़ी क्यों?

जांच प्रतिवेदन में गड़बड़ियों से साफ पल्ला झाड़ते हुए शिकायत को “निराधार” लिखा गया है। लेकिन सवाल तो यही है—
जब शिकायतकर्ता को सुना ही नहीं गया, तो शिकायत को निराधार कैसे मान लिया गया?

स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि लाखों की राशि की जांच ऐसे निपटा दी गई जैसे कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता हो।

क्या बचाया जा रहा है किसी को?

आरोपित प्रबंधक को जांच में बुलाया गया,

उसी के बयान को आधार बनाया गया,

जांच अधिकारी को “कुछ गलत” दिखा ही नहीं,

शिकायतकर्ता को दूर रखा गया…

यह पूरा घटनाक्रम अपनी आप में गंभीर शंका पैदा करता है कि कहीं विभाग किसी को बचाने की कोशिश तो नहीं कर रहा?

पारदर्शिता पर गहरा प्रश्नचिह्न

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत कहता है—
जिसके खिलाफ या पक्ष में मामला हो, उसे सुना अवश्य जाए।
लेकिन इस जांच में यही सबसे महत्वपूर्ण कदम गायब रहा।
अब यह देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले पर पुनः गंभीरता से विचार करेगा या नहीं।

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