34 बच्चों की एंट्री, करीब 15 के घर रहने का दावा… 40 KM दूर पदस्थ अधीक्षक को अतिरिक्त प्रभार, अब बाहरी व्यक्ति और मीडिया की एंट्री पर रोक ने बढ़ाया सस्पेंस!
कोरबा। प्राथमिक स्तर आदिवासी बालक आश्रम बरपाली को लेकर सामने आ रहे आरोप अब सिर्फ बच्चों की कथित फर्जी एंट्री और अधीक्षक के अतिरिक्त प्रभार तक सीमित नहीं हैं। आश्रम में बाहरी व्यक्तियों और मीडिया कर्मियों के प्रवेश को लेकर लगाई गई कथित रोक ने पूरे मामले को और गंभीर सवालों के घेरे में ला दिया है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है, जिसे लेकर आश्रम के दरवाजे बाहरी लोगों और मीडिया के लिए बंद किए जा रहे हैं?
क्या यह सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था है या फिर आश्रम की वास्तविक स्थिति सामने आने का डर?
फिलहाल इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन जिस समय आश्रम में बच्चों की कथित फर्जी एंट्री के आरोप सामने आ रहे हैं, उसी समय मीडिया और बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक की बात सामने आना निश्चित तौर पर सवाल खड़े करती है।

50 सीटर आश्रम में 34 बच्चे… करीब 15 के घर रहने का दावा!
आश्रम 50 सीटर बताया जा रहा है और रिकॉर्ड में 34 बच्चों की एंट्री होने की जानकारी सामने आ रही है। वहीं स्थानीय स्तर पर दावा है कि इनमें से करीब 15 बच्चे आश्रम में रहते ही नहीं, बल्कि अपने घर पर भोजन करने और रात में घर पर रहने की बात कही जा रही है।
अब सवाल यह है—
अगर बच्चे आश्रम में नहीं रहते तो उनके नाम रिकॉर्ड में क्यों हैं?
उनके नाम पर भोजन और राशन का हिसाब कैसे तैयार होता है?
क्या विभाग ने कभी अचानक मौके पर पहुंचकर सभी बच्चों का भौतिक सत्यापन किया?
इन सवालों का जवाब रजिस्टर से नहीं, बल्कि बच्चों के घर जाकर सत्यापन से मिलेगा।
40 KM दूर अधीक्षक… फिर भी बरपाली का अतिरिक्त प्रभार!
आश्रम के अधीक्षक राकेश कौशिक की मूल पदस्थापना करतला स्थित पोस्ट मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास में बताई जा रही है, जबकि बरपाली आश्रम का अतिरिक्त प्रभार भी उन्हीं के पास है।
करतला से बरपाली करीब 40 किलोमीटर दूर है।
तो सवाल फिर वही—
एक अधिकारी दो जगह की जिम्मेदारी आखिर कितनी प्रभावी तरीके से निभा रहा है?
क्या विभाग को बरपाली के लिए कोई दूसरा पात्र कर्मचारी नहीं मिला?
अतिरिक्त प्रभार देने की जरूरत और वजह क्या थी?
और अब सबसे बड़ा सवाल—मीडिया से दूरी क्यों?
सरकारी आश्रम जनता के पैसे से संचालित होते हैं और यहां रहने वाले बच्चे समाज के सबसे संवेदनशील वर्गों में आते हैं। ऐसे में व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अगर आश्रम में सब कुछ नियमों के मुताबिक चल रहा है तो—
मीडिया कर्मियों के प्रवेश से परेशानी क्या है?
बाहरी लोगों को वास्तविक स्थिति देखने से रोकने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या अचानक निरीक्षण होने पर रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में अंतर सामने आने की आशंका है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि प्रवेश पर रोक का कथित फर्जी एंट्री के आरोपों से कोई संबंध है। लेकिन दोनों घटनाएं एक साथ सवाल जरूर खड़े करती हैं।
विभाग चाहे तो एक दिन में खुल सकता है पूरा सच
जरूरत सिर्फ एक अचानक और निष्पक्ष निरीक्षण की है।
अधिकारियों की टीम बिना पूर्व सूचना आश्रम पहुंचे और—
सभी दर्ज बच्चों की मौके पर गिनती करे।
बच्चों का घर जाकर भौतिक सत्यापन कराए।
उपस्थिति रजिस्टर की जांच करे।
भोजन रजिस्टर और राशन स्टॉक का मिलान करे।
खरीदी के बिल-वाउचर और भुगतान रिकॉर्ड जांचे।
अधीक्षक की करतला और बरपाली में उपस्थिति का रिकॉर्ड देखे।
अतिरिक्त प्रभार से जुड़ी नोटशीट और आदेश की जांच करे।
फिर साफ हो जाएगा कि कागज कितना सच बोल रहे हैं और जमीन पर कितनी हकीकत है।
**दरवाजा बंद करने से सवाल बंद नहीं होते!
अगर सब कुछ पारदर्शी है तो जांच और मीडिया के सवालों से डर कैसा?
और अगर रिकॉर्ड और हकीकत में कोई अंतर नहीं है, तो विभाग को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।**
अब देखना यह है—बरपाली आश्रम के इन सवालों पर विभाग जांच की ‘रोशनी’ डालता है या फिर फाइलों के अंधेरे में मामला दबा दिया जाएगा?
Public 24X7 Live की पड़ताल जारी है…
आश्रमों और छात्रावासों से जुड़े दस्तावेजों की परतें खुलेंगी।
अगली खबर में और भी सवाल… और भी खुलासे।
