17 घंटे से अंधेरे में आधा दर्जन गांव! CM हेल्पलाइन भी बेअसर, पूर्व सांसद के गृहग्राम में ग्रामीणों ने किया रतजगा

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कोरबा-बरपाली। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी की बदहाल व्यवस्था ने एक बार फिर ग्रामीणों का सब्र तोड़ दिया है। बरपाली वितरण केंद्र के अंतर्गत आने वाले तुमान फीडर में पिछले 17 घंटे से बिजली गुल है। भीषण गर्मी और उमस के बीच आधा दर्जन से अधिक गांवों के लोग पूरी रात जागने को मजबूर रहे। हैरानी की बात यह रही कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और विभागीय शिकायत के बाद भी बिजली बहाल नहीं हो सकी।

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सबसे ज्यादा नाराजगी इस बात को लेकर है कि पूर्व सांसद स्वर्गीय डॉ. बंशीलाल महतो के गृहग्राम सलिहाभांठा समेत कई गांव अंधेरे में डूबे रहे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी न मौके पर पहुंचे और न ही ग्रामीणों के फोन उठाए।

ग्रामीणों के अनुसार, 28 जून शाम 4 बजे से सलिहाभांठा, बंधवाभांठा, डोंगरीभांठा, पकरिया, सराईडीह सहित कई गांवों की बिजली बंद है। विभाग की ओर से सिर्फ 11 केवी लाइन में फॉल्ट और ब्रेकडाउन का हवाला दिया जाता रहा, लेकिन घंटों बीतने के बाद भी समस्या जस की तस बनी रही।

रात करीब 11:30 बजे 1912 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई गई, जबकि सुबह मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर भी शिकायत की गई। इसके बावजूद बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हुई। पूरी रात इनवर्टर जवाब दे गए, मोबाइल बंद हो गए, पंखे और कूलर ठप पड़ गए और लोग उमस भरी गर्मी में रातभर रतजगा करते रहे।

बिजली नहीं होने से ग्रामीणों को पीने के पानी तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। नल-जल योजना पहले से अधूरी है, ऐसे में लोग निजी बोर और हैंडपंप पर निर्भर हैं, लेकिन बिजली गुल होने से बोर भी बंद पड़े हैं।

अधिकारी हटाने की मांग तेज

ग्रामीणों का आरोप है कि तुमान फीडर में बिजली कटौती अब आम बात बन चुकी है। कभी ब्रेकडाउन, कभी 11 केवी फॉल्ट, कभी 33 केवी लाइन में पेड़ गिरने का बहाना बनाकर घंटों बिजली बंद रखी जाती है। सबसे गंभीर बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी न फोन उठाते हैं और न ही मौके पर पहुंचते हैं।

ग्रामीणों ने ऐसे अकर्मण्य अधिकारियों को हटाने की मांग दोहराते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वोट के समय गांव याद आते हैं, लेकिन जनता की मूलभूत समस्याओं पर कोई जनप्रतिनिधि आवाज उठाने नहीं आता।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत के बाद भी अगर ग्रामीणों को 17 घंटे तक अंधेरे में रहना पड़े, तो आखिर जवाबदेह कौन है?

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